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गुडगाँव मानेसर धारूहेड़ा बावल के मजदूरों और हरियाणा के मेहनतकश जनता की एकता को और भी ठोस बनाएं!

April 30, 2013

मई दिवस के अवसर पर मज़दूरों और मेहनतकश जनता के जीवन पर पूंजीपतियों और उनकी खुशामत करने वाली सरकार के आघात को कड़ी चुनौति देने की शपथ लें!

 

साथियों,                                                                                   

4 जून 2011 से चल रहे हमारे आन्दोलन के अनुभवों ने हमारे सामने मई दिवस और उसके शानदार इतिहास की एक नयी महत्ता स्थापित की| आन्दोलन और दमन की ताप में पक कर यह इतिहास हमें आज और भी ठोस और साफ़ नज़र आ रहा है| आन्दोलन और दमन के इस सिलसिले में हमें क्या कुछ देखने को नहीं मिला! हमारी एकता और मानेसर के अन्य मजदूरों के समर्थन के फलस्वरूप जब हम तीन दफ़ा हड़ताल करने के बाद आखिरकार अपनी यूनियन बनाने में सफल हुए तो मारुति प्रबंधन और प्रशासन ने हमारी एकता को तोड़ने के लिए 18 जुलाई के षड्यंत्र के तहत हममें से 546 स्थाई और 1800 ठेका मजदूरों को कंपनी से बाहर कर दिया| साथ ही हमारे 147 बेक़सूर साथियों को हवालात में डाल  दिया और अन्य 66 मजदूरों के खिलाफ ग़ैर-जमानती वारंट निकाल दिए| जब हम आज कंपनी में काम कर रहे अपने साथियों की दयनीय स्थिति देखते हैं तो प्रबंधन द्वारा रची गयी 18 जुलाई की झूठी कहानी के पीछे का मकसद साफ़ नज़र आता है| अन्दर काम करने वाले मजदूर आज हमारे आन्दोलन के पहले चरण में जीते गए सारे हकों से वंचित हैं| पहले से कम संख्या में मजदूर आज पहले से ज़्यादा काम कर रहें हैं| मजदूरों में अपनी यूनियन को पुनःस्थापित करने की सुगबुगाहट होने पर प्रबंधन ने फ़ौरन ही 13 मजदूरों का देश के विभिन्न कोनों में स्थानान्तरण कर उस पहल को वहीँ कुचल दिया| ऐसे में कैथल ज़िले में 24 मार्च से चल रहा हमारा प्रदर्शन बस हमारे हकों की मुहीम नहीं बल्कि, मारुति के सभी मजदूरों के अधिकारों का संघर्ष है|        

इस पूरे घटनाक्रम में हमने हर कदम पर हरियाणा सरकार को मजदूरों के हकों की रक्षा करने के बजाए मारुति प्रबंधन के गैरकानूनी हथकंडों में उनका समर्थन करते पाया| चुनाव के समय हमसे सैकड़ों झूठे वादे करने वाले इन मंत्रियों ने हमें बार बार साफ़ शब्दों में कहा की वह मारुति के हितों के खिलाफ नहीं जा सकते| बिना किसी जांच पड़ताल के इन्होंने हमें दोषी घोषित कर दिया| हमारे शांतिपूर्ण आन्दोलन के खिलाफ सैकड़ों की तादात में पुलिसकर्मियों को तैनात किया| जनतांत्रिक हकों की हमारी मांग अन्य कारखानों में काम कर रहे मजदूरों तक न पहुंचे इस लिए हरियाणा प्रशासन ने पिछले 9 महीने से मानेसर इलाके में किसी भी धरना, प्रदर्शन या जुलूस करने की अनुमति नहीं दी, यहाँ तक की परचा बाटने तक पर उनहोंने हमारे कुछ साथियों को हिरासत में ले लिया| हमारी न्यायिक मांगे हरियाणा सरकार को इतनी नापसंद हैं की उन्हों ने हमें गुडगाँव के डी.सी कार्यालय के सामने धरना देने की अनुमति तक नहीं दी और कैथल में उद्योग मंत्री सुरजेवाला के निवास के सामने से भी हमारे धरने को उठाने की विभिन्न कोशिशें की|  

विगत दो सालों में हमारे सामने आई चुनौतियों की रौशनी में जब हम मई दिवस की कहानी याद करते हैं तो इस संघर्ष को इसकी सही मुकाम तक ले जाने का हमारा संकल्प हमारे सीने में लोहे जैसा भारी और ठोस महसूस होता है| 1 मई, 1886 को “8 घंटे के काम” की मांग ले कर शिकागो के 80,000 मजदूरों द्वारा निकाले गए जुलूस ने मई दिवस की परंपरा की स्थापना की| इसके बाद मजदूर आन्दोलनों ने कई सफलताएँ हासिल की | इस सब के बाद भी आज हम देखते हैं की मजदूरों की बड़ी आबादी गैरकानूनी ठेका प्रथा से पीड़ित 12 से 16 घंटे फैक्ट्रियों में कमरतोड़ मेहनत करने को मजबूर है, बेरोज़गारी की तड़प में मजदूर एक दुसरे के खिलाफ इस्तेमाल किए जाते हैं और मुठ्ठी भर पूंजीपतियों के ऐशोआराम के लिए समाज में  बहुसंख्यक मेहनतकश जनता का जीवन हर दिन और भी नीरस और मजबूर बनता जा रहा है| पूंजीपति शोषण के इस विभस्त चक्र को तोड़ने के दीर्घ कालीन संघर्ष में हमारे पूर्वजों के बलिदानों ने हमारे लिए संघर्ष की एक शानदार विरासत छोड़ी है| आज जब पूंजीवादी तंत्र और उसकी पक्षधर सरकार कण कण कर हमसे इस विरासत को छिनने की कोशिश कर रही है तो इसकी सुरक्षा करने और मजदूर आन्दोलन को आगे लेजाने की गंभीर ज़िम्मेदारी को हमें पूरी निष्ठां से स्वीकार करनी होगी|

अपने आन्दोलन के दौरान हमने देखा है की किस तरह मालिक संगठित होने के बुनियादी हक़ से ले कर मजदूरों की हर छोटी बड़ी न्यायिक मांग को नज़रअंदाज़ करते हैं| हमारे आन्दोलन के मुख्य दो मांगे रही हैं – हमारा संगठित होने का हक़ और गैरकानूनी ठेकाप्रथा का पूर्ण खात्मा| यह दोनों ही मांगे हमारे संवैधानिक हकों के दायरे में हैं परन्तु न केवल प्रबंधन बल्कि मीडिया और उस संविधान की बुनियाद पर कड़ी सरकार ने भी हमारी इन मांगों को हर कदम पर ठुकराया और गलत ठहराने की कोशिश की| यूनियन बनने के बाद प्रबंधन ने हमारे मांगपत्र में ठेका मजदूरों के स्थायीकरण के मुद्दे पर बात करने से साफ़ इनकार कर दिया| मालिक को स्थाई और ठेका मजदूरों की एकता नाबर्दाश्त है| ठेकाप्रथा जहाँ आज एक ओर मालिकों के मुनाफे का मुख्य आधार बनी गयी है वहीँ दूसरी ओर देश और विश्वभर में मजदूरों की दुर्गति का मूल कारण बन गयी है| यह मालिकों के हाँथ में मजदूर आन्दोलन को विभाजित करने का ब्रम्हास्त्र है| इसका सामना हम केवल अपनी एकता को और व्यापक बना कर और स्थाई और ठेका मजदूर के बीच के अंतर के खिलाफ सशक्त आन्दोलन चला कर ही कर सकते है| यह सबक हमें अपने संघर्ष से ही मिला है|              

साथियों, मई दिवस मजदूरों की एकता और उससे उभरती ताकत का जश्न है! परन्तु आज यह एकता जर्जर स्थिति में है और इसे पुनः स्थापित करने में हमारे सामने कई समास्याएं है| मजदूरों की असंतुष्टता और आक्रोश से कई एक स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों के उभरने के बावजूद भी इन आन्दोलनों को झुझारू दिशा में आगे लेजाने के लिए एकसही दिशा से युक्त ज़िम्मेदार नेतृत्व का आभाव महसूस हो रहा है| स्थाई और ठेका मजदूरों की एकता को कायम करने में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है| पिछले कुछ समय में अलग अलग फैक्ट्रियों में यूनियन बनने के बावजूद भी विभिन्न फैक्ट्रियों के मजदूरों के बीच एकता को और भी बुलंद करने की ज़रुरत है| इन कई समस्याओं के कारण शुरू के झुझारू दौर के बाद हमारे आन्दोलन हताश हो जाते हैं या समझौता करने पर विवश कर दिए जाते हैं| आज गुडगाँव-मानेसर-धारूहेड़ा-बवाल का औद्योगिक क्षेत्र देश के प्रमुख उद्योगिक क्षेत्रों में से है| यहाँ की मजदूर आबादी ने पिछले कुछ समय में कई बड़े आन्दोलनों का अनुभव किया है| ऐसे में महत्वपूर्ण है की हम इन अनुभवों से निकली सीखों को आत्मसात कर इनका समाधान निकलने की पुरज़ोर कोशिश करें और साथ ही इन्हें देश भर के अन्य मजदूरों तक पहुंचाएं| कहीं के भी मजदूरों का उत्पीडन पूरे मजदूर आन्दोलन को कमज़ोर बनाता है| इसके खिलाफ एक फौलादी एकता को तैयार करना आज हमारा सबसे प्रमुख लक्ष्य है| आज मई दिवस के अवसर पर हम आज पूरे देश के मजदूरों के सामने इस लक्ष्य को पेश करना चाहते हैं और खुद को पूरी तरह इस संघर्ष में समर्पित करने की शपथ लेते हैं|   

 

 

 

 

 

प्रोविजनल वर्किंग कमेटी, मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन द्वारा प्रकाशित|

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