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अपील (जेल की बंद दीवारों से): न्याय के लिए हमारे समर्थन में खड़े हों; Appeal from Jail Stand in Solidarity with us for Justice

March 27, 2013

अपील (जेल की बंद दीवारों से)
न्याय के लिए हमारे समर्थन में खड़े हों

मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन
(रजि. नॉ.
1923, IMT मानेसर)

 

हम मारुति सुजुकी के वो मजदूर है जिनको 18-7-2012 की दुर्घटना का इल्जाम लगाकर बिना किसी न्यायिक जांच के जेल में डाल दिया गया हैं. हम 147 मजदूर अभी भी गुडगाँव सेंट्रल जेल के सलाखों के पीछे बंध हैं. जुलाई के बाद लगभग 2500 पक्के और कच्चे कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. पिछले 8 महीनों से हम हरियाणा और केन्द्रीय सरकार के बहुत सारे उच्च अधिकारियों, हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री जी को भी कई बार अपील कर चुके हैं. लेकिन न तो हमारी कहीं सुनाई हो रही है, न ही हमें जमानत दी जा रही है. और तो और, जो हरियाणा पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में पेश की है, उसमें किसी गवाह का नाम नही है और वह आधी अधूरी है. हमारा लोकतान्त्रिक अधिकारो का हनन लगातार हो रहा हैं, और कानून को कंपनी मालिकों के स्वार्थ में व्यवहार किया जा रहा हैं. इस दौरान बहत से कर्मचारियों ने अपने परिवार के सदस्य के साथ-साथ बहत कुछ खो दिया है. काफी मजदूर ऐसे भी है जिनके माता-पिता नहीं हैं और पुरे परिवार का पालन पोषण का भार उन्ही पर है. काफी ऐसे भी साथी हैं, जब उन्हें जेल में डाला गया, तब उनकी पत्नियाँ गर्भवती थी. उनकी डिलीवरी के समय भी कर्मचारियों को न तो जमानत दी गयी, न ही पे-रोल पे छुट्टी दी गयी और न ही पे-रोल कस्टडी में ही भेजा गया. परिवार में अकेली होने के कारण व पति के जेल में होने के कारण, पता नहीं किन परिस्थितियों में उनकी डिलीवरी हुई है. इसके हम निचे कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है:-

  1. हमारे एक साथी सुमित S/O स्वर्गीय श्री छत्तर सिंह के घर में सुमित और उनकी पत्नी के अलावा कोई अन्य पारिवारिक सदस्य नहीं है. लेकिन फिर भी दिनांक 6.12.2012 को उनकी पत्नी की डिलीवरी गुडगाँव के एक अस्पताल में हुई और उनकी देखभाल के लिए सुमित को कोई भी राहत प्रदान नहीं की गई.
  2. हमारे एक साथी विजेंद्र S/O स्वर्गीय श्री दलेल सिंह अपने परिवार का पालन पोषण करनेवाला अकेला सदस्य है. उसके घर में उसकी पत्नी व बिमार माँ है. उसकी पत्नी की डिलीवरी 10.01.2013 को झज्जर के एक अस्पताल में हुई. विजेंद्र के माँ के बिमार होने के कारण उसकी पत्नी कि डिलीवरी के समय देखभाल करनेवाला कोई नहीं था. लेकिन फिरभी विजेंद्र को पत्नी के देखभाल के लिए डिलीवरी के समय कोई राहत नहीं दी गई.
  3. हमारे साथी रामबिलास S/O स्वर्गीय श्री सीलक राम की दादीमा 26.02.2013 को रामबिलास के वियोग में बिमार हो कर स्वर्ग सिधार गई, क्योकि वह उसकी दादीमा का बहुत लाडला था. और तो और उसे दाह-संस्कार में सामिल होने या दादीमा के अंतिम दर्शन करने के लिए पेरोल कस्टडी में भी नहीं ले जाया गया. कुछ ही दिनों के बाद जब उसकी पत्नी कि डिलीवरी होनी थी तो उसकी जमानत या छुट्टी के लिए याचिका लगाई गई तब भी उसे कोई राहत नहीं दी गई. इससे उसके ऊपर बड़ा मानसिक आघात हुआ है.
  4. हमारे एक साथी प्रेमपाल S/O श्री छिद्दीलाल के उपर पुरे परिवार के पालन पोषण का भार है, वह जब जेल में आया था तब उसके परिवार की रोजी-रोटी उसी के बलबूते पर टिकी हुई थी. परन्तु उसके जेल में आने के बाद उसकी इकलौती बेटी जो मात्र दो साल की थी, जो अपने पापा के वियोग में बीमार होकर पापा-पापा करते हुए भगवान को प्यारी हो गई. ये जख्म अभी हरा ही था कि तभी कुछ दिन बाद प्रेमपाल की माँ बेटे के वियोग में व अपनी लाडली पोती के वियोग में बीमार होकर स्वर्ग सिधार गई. हद तो तब हो गई जब उसकी एक सप्ताह कि छुट्टी भी ख़ारिज कर दी गई व उसे मात्र एक घंटे के लिए दाह-संस्कार होने के अगले दिन पे-रोल कस्टडी में भेजा गया. जबकि गुडिया व माताजी के देहांत के दुःख में घर में अकेली उसकी पत्नी भी बीमार होने के कारण अस्पताल में दाखिल करवानी पड़ी जो अभी भी बिमार है तथा उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है. और इस कारण प्रेमपाल बहुत अधिक मानसिक दबाव में है.
  5. हमारे एक साथी राहुल S/O श्री विनोद रतन जो घर में अपने माँ-बाप का एक इकलौता बेटा है व उसकी एक ही बहन है. उसकी बहन कि शादी दिनांक 16.11.2012 को हुई. परन्तु उसे कस्टडी में भी अपनी बहन के शादी के कन्यादान के लिए नहीं भेजा गया जिसके कारण घर की इकलौती बेटी की शादी होते हुए भी घर में मातम जैसा माहौल रहा और राहुल मानसिक दबाव में है.
  6. हमारे एक साथी सुभाष S/O श्री लाल चंद जो कि अपनी दादीमा का बहुत लाडला था. जब वह जेल में आया तो उसके वियोग में उसके दादीमा खाना-पीना छोड़ दिया व कुछ दिन में ही अपने पोते को याद करते हुए स्वर्ग सिधार गई. परन्तु सुभाष को दाहसंस्कार या अंतिम दर्शन के लिए पे-रोल कस्टडी में भी नहीं भेजा गया.

ऐसी और कितनी ही दुख भरी घटनाएँ है जिन्हें लिखते लिखते एक पूरी किताब बन जाये !

हमारे बारे में: परिचय, परिवार, नौकरी

हम सभी किसान या मजदूरों के बच्चे हैं. माँ-बाप ने हमे बड़ी मेहनत से खून-पसीना एक करके 10वी-12वी या ITI शिक्षा दिलवाई व इस लायक बनाया कि इस जीवन में कुछ बन सके व अपने परिवार का सहारा बन सके.

हम सभी ने कंपनी द्वारा भर्ती प्रक्रिया में लिखित व् मौखिक परीक्षायों को पास करके व् कंपनी की जो जो भी नियम व शर्ते थी, उनपर खरे उतर कर मारुति कंपनी को ज्वाइन किया. जोइनिंग करने से पहले, कंपनी ने सभी प्रकार से हमारी जांच करवाई थी, जैसे- घर की थाने तहसील की व क्रीमिनल जांच करवाई गई थी! पिछले समय का हमारा कोई क्रिमिनल रिकार्ड नहीं हैं.

जब हमने कंपनी को ज्वाइन किया तब, कंपनी का मानेसर प्लांट निर्माणाधीन था. हमने अपने कड़ी मेहनत व लगन से अपने भविष्य को देखते हुए, कंपनी को एक नयी उचाई पर ले गए. जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छायी हुई थी, तब हमने प्रतिदिन दो घंटे एक्स्ट्रा टाइम देकर साल में 10.5 लाख गाड़ियों का निर्माण किया था. कंपनी की लगातार बढ़ते मुनाफा का हम ही पैदावार रहे हैं, जबकि आज हमे अपराधी और खूनी ठहराया जा रहा हैं.

हम लगभग सभी मजदूर गरीब मजदूर-किसान परिवारों से हैं जिनकी जीविका हमारी नौकरी पर ही निर्भर हैं. हमनें अपने व अपने परिवार के भविष्य के सपने बुन रखे थे, कि हमारा भी अपना घर होगा. भाई-बहन व बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे, ताकि उनका भविष्य भी उज्जवल हो सके व माता-पिता जिन्होंने इतने कष्ट उठाकर हमें इस लायक बनाया कि हम अपने पैरों पे खड़े हो सकें, उनका जीवन आरामदायक बनायेंगे.

कंपनी में हमारा हर प्रकार से शोषण हो रहा था, जैसे कि

 

  1. किसीको भी तबियत ख़राब होने पर डिस्पेंसरी न जाने देना व बिमारी की हालत में भी पूरा काम करवाना.
  2. यहाँ तक कि टॉयलेट भी नहीं जाने दिया जाता था. केवल लांच या टि-टाइम में ही जाने दिया जाता था.
  3. अधिकारीयों का कर्मचारियों के साथ भद्दा व्यवहार व गालिया देना और कभी कभी तो दंड देने के लिए थप्पड़ मारना व मुर्गा बना देना.
  4. यदि किसी कर्मचारी के साथ या उसके परिवार के किसी सदस्य के साथ दुर्घटना या कोई समस्या होने पर या यहाँ तक की किसी सम्बन्धी की मृत्यु होने पर यदि कर्मचारी दो या चार दिन की छुट्टी लेता था, तो उसकी सेलरी का आधा भाग, लगभग नौ हज़ार रुपये काट लिया जाता था.

इस प्रकार शोषण के कारण कर्मचारियों को यूनियन कि जरूरत महसूस हुई. कंपनी यूनियन के खिलाफ थी, जिनके कारण हमारी साल 2011 में तीन हड़ताल हुई, जिसमे हमारे तीस साथियों को नौकरी से निकाल दिया गया. लेकिन आख़िरकार हमने फरवरी 2012 में यूनियन का रजि. करवाया, जिसमे हमारी मदद एच.आर. मैनेजर स्वर्गीय श्री अवनिश कुमार देव ने कि थी. हमारी मदद करने के कारण कंपनी देव जी से बहुत खफा हो गई थी, जिसके चलते देव जी ने नौकरी से अपना इस्तीफा दे दिया था. कंपनी ने पोल खुलने के डर से उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया था. यूनियन को तोडवाने व देव जी को रास्ते से हटाने के लिए एक योजनाबंध तरीके से बाउन्सरों व गुंडों को बुलाकर 18  जुलाई 2012 की ‘दुर्घटना’ को अंजाम दिया.

 

अब कि स्थिति

हम 147 मजदूरों को बिना किसी न्यायिक जाँच किये जेल में डाल दिया गया. हमारा जेल में बंध रहते 8 महीनें से ज्यादा समय हो चुका है. यहाँ जेल में हम बहुत मानसिक दबाव झेल रहे है. कई लोगों को टी. बी., पिलिया व किसीको दौरे पड़ रहे है. और बहुत सारे कर्मचारियों को अन्य काफी बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है.

हमारे लगभग सभी परिवारों में कमाने वाले केवल हम थे जो जेल में बंध हैं. जिसके कारण परिवारों को भूखे मरने की नोबत आ गई है. औरोतों और बच्चों कि शिक्षा तक भी छुट गई है जो कि उनका मौलिक अधिकार है. हमारा और हमारे परिवार का भविष्य अंधकार हो गया है. हमारे परिवार के सभी सदस्य भी मानसिक तौर पर बहुत परेशान है. हमे डर हैं कि वो परेशानी के कारण कोई गलत कदम न उठाये.

 

जेल से बाहर कर्मचारियों कि मौजूदा स्थिति 

147 कर्मचारियों को जेल में डालने के साथ साथ कंपनी ने लगभग 2500 कच्चे और पक्के कर्मचारियों की बिना किसी न्यायिक जाँच के नौकरी से निकाल दिया और वह बेरोजगार हो गए. उनकी परिवारों की  स्थिति भी गंभीर है. यहा तक कि उनके पास कोई एक्सपीरियंस डोकुमेंट प्रूफ नहीं है और उनका पूरा कैरियर बर्बाद हो चूका है और उनमे से जो भी कोई हमारी पैरवी करने के लिए आगे आता है, उसे भी उठाकर जेल में डाल दिया जाता है (जैसे साथी ईमान खान के साथ किया गया, जिसका नाम कोई एफ.आई.आर., चार्जशीट या एस.आई.टी. रपट में नहीं था; 65 मजदूरों के ऊपर अभी भी गैर-जमानती वारंट जारी हैं). जेल में बंध कर्मचारियों और बाहर बेरोजगार कर्मचारियों के पास अपनी जीविका चलाने का कोई भी साधन नहीं है, जिसके चलते सभी मानसिक दबाव में है. लेकिन इन हालातों के बीच भी जेल के बहार के हमारे साथी जो न्याय के लिए संघर्ष जारी रखे हैं, उससे हमे इन सलाखों के पीछे भी आशा और उर्जा मिलती हैं. आठ महीने के उपर चल रहे इस संघर्ष में हमे देश के अलग अलग प्रान्त से मजदूर, मेहनतकश और आम जनता के समर्थन के खबरे आती रही हैं, जो भी हमे उम्मीद देती रही हैं.

हम अपनी जाँच की मांगों को लेकर सरकार के लगभग सभी मंत्रियों से मिल चुके हैं. राज्य उद्योग मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री से भी न्याय की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन सरकार हरियाणा के मजदूर-कर्मचारियों की बजाये कंपनी मालिकों की ही तरफ झुकी हुई है. हम अंतिम बार सरकार से अपील करते है कि मरने या मारने के इस मुकाम तक पहुचने से पहले हमारे साथ न्याय हों.

हमे आपकी समर्थन और राय कि जरुरत है. कृपया अपनी राय और सहायता दें !

 

मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन

(MSWU यूनियन के पूरे पदाधिकारी गुडगाँव सेंट्रल जेल के अन्दर बंध हैं, जहा अभी भी 147 मजदूर बिना जांच या जमानत कैद हैं; यह अपील कि चिट्ठी वही से भेजी गई हैं.)

 

Appeal from Jail
Stand in Solidarity with us for Justice

MARUTI SUZUKI WORKERS UNION
(Reg. No. 1923, IMT Manesar)

 

We are workers of Maruti Suzuki, who are behind bars since 18.07.2012 as part of a conspiracy, and without any just investigation. 147 of us are inside Gurgaon Central Jail. Since July, 2500 permanent and contract workers have been terminated from our jobs. In these past more than 8 months, we have sent our appeal to almost all administrative officials and elected representatives, including Chief Minister Haryana and the Prime Minister of India. But neither have our appeals been heard nor have we been granted bail. The Chargesheet filed by the Haryana police in the Court has no names of any witnesses, and hence is incomplete. This is only a glimpse of the continuous attack on our democratic rights on arbitrary grounds, and we see how law is bent towards siding with company owners. Many of our fellow workers are without parents or guardians, and have been shouldering the entire burden of the household. Many workers’ wives were pregnant when we were put behind bars. And even when the time of their delivery came, the workers were not granted bail, or even parole custody. We do not know under what circumstances their deliveries took place. We give a few instances:

  1. One of our fellow workers, Sumit s/o Late Shri Chattar Singh, has no one in the family except his wife. Even then, when she gave delivery on 6.12.2012 in a hospital in Gurgaon, the bail plea or parole custody plea of Sumit was rejected.
  2. One of our fellow workers, Vijendra s/o Dalel Singh was the lone earning member in his family. His mother stays sick at most times and was not able to accompany or help her daughter-in-law when she gave her delivery on 10.01.2013 in a hospital in Jhajjhar. Even then, Vijendra was neither granted bail nor let off on parole.
  3. In the case of one of our fellow workers, Ramvilas s/o Late Shri Silak Ram, his grandmother, who fell sick after Ramvilas was put behind the bars as he was too affectionate to her, passed away on 26.02.2013. Ramvilas was not even let off on parole to meet his grandmother on her death-bed or to attend the funeral. After few days when it was the time of his wife’s delivery, his request for bail or parole custody was turned down. It caused a mental shock to him.
  4. One of our fellow workers, Prempal, s/o Shri Chhiddilal, had the responsibility to look after his family alone, as his family’s livelihood depended entirely depended on his earnings. When he was thrown into jail arbitrarily, his two years old daughter mourning her father’s absence, fell sick and breathed her last. This wound was yet to heal, when Prempal’s mother aggrieved by the imprisonment of her son and the death of her granddaughter fell sick and passed away. But even after this, Prempal’s meager one-week parole leave permission was rejected and he was allowed only a one-hour parole visit on the next day of his grandmother’s funeral. His wife, now alone in the house and mourning the death of her daughter and Prempal’s mother, fell sick and had to be hospitalized. She is still unwell and there is no one to look after her. It has caused terrible mental agony for Prempal.
  5. One of our fellow workers, Rahul, s/o Shri Vinod Ratan, was the only son of his parents, along with a sister. His sister got married on 16.11.2012. But he was not even granted parole custody to attend the ceremony for kanyadan. The marriage of the sole daughter took place in an environment of sadness, and Rahul is yet to recover from this wound.
  6. One of our fellow workers, Subhash, s/o Shri Lal Chand, was very close to his grandmother. After his imprisonment, his grandmother almost stopped taking food and all the time used to think of his grandson, and passed away in grief some days later. But Subhash was not allowed even to attend her funeral on parole custody.

These and many other incidents that go on daily in our lives are enough to fill up the pages of an entire book.

 

About ourselves: our identity, family and work 

We all are children of workers and peasants. Our parents, with huge effort and sacrifice, ensured our 10th standard, 12th standard or ITI education, helped us stand on our feet to do something worthy in our life and help our family in need.

We all joined Maruti Suzuki company after passing the written and viva-voce tests conducted by the company and on the terms and conditions set by the company. Before our joining, the company carried out all kinds of investigations, like police verification of our residential proof or whether we had criminal records! Neither of us had any previous criminal record.

When we joined the company, the Manesar plant of the company was under construction. At that stage we foreseeing our future with the progress of the plant invested huge energy and diligence to lift the Manesar plant of the company to a new height. When the entire world was struggling under the economic crisis, we worked extra two hours daily to materialize a production of 10.5 lakh cars in a year. We were the sole creators of the increasing profit of the company, and today we are implicated as criminals and murderers, and those who engage in ‘mindless arson’!

Almost all of us are from poor worker or peasant families which has been dependent on our job. We were struggling to weave dreams for our and our family’s future, such as of our own homes, of the better education for our brothers-sisters and children so that they could have a bright future and ensure a comfortable life for their parents who took the pain to bring after them.

But in return, we were being exploited inside the company in all possible ways, such as:

  1. At work, if any worker was unwell, he was not allowed to go to the dispensary and was forced to continue with the work in that condition.
  2. We were not allowed to go to the toilet, the permission was there only at tea or lunch time.
  3. Management used to behave with the workers very rudely with abusive language, and used to even slap or make them murga in order to punish them.
  4. If a worker was forced to take 3-4 days leave because of his ill health or some accident or other serious problem in his family or because of the death of a relative, then half of his salary which amounted to almost Rs. 9000 used to be deducted by the company.

Because of this continuous exploitation, the workers felt the need of forming a Union. Maruti Suzuki company was against the idea of a union, and because of that, three strikes of the workers took place in 2011. After the third strike, thirty fellow workers of ours were forced to resign as they had participated in the strikes. But at last in February 2012 we were successful in registering our Union, in which the then HR Manager, Late Shri Awanish Kumar Dev, helped us. The company was angry with Mr. Dev because of his helpful attitude towards us and as a result, Mr. Dev resigned from the company. But the company did not accept the resignation of him as they were afraid that their misdeeds could get exposed. To crush the union and to remove Mr. Dev from its way, the company with a previously chalked out plan called the bouncers and hooligans in the factory premises on 18th July 2012 and materialized the ‘accident’.

 

The present situation of the workers inside the Jail

We, 147 workers in total, were thrown behind the bars without any just enquiry, and we are now here for more than 8 months. We are under severe psychological stress inside the jail. Many of us are suffering from diseases like tuberculosis, piles, mental imbalance and several other diseases.

Almost all of us were earning members in our family and we are in jail now. Due to this our families are approaching the situation of dying of hunger. The education of the female members of the family and the children have stopped, which are otherwise their fundamental rights. The future of ours and our families has plunged into darkness. All the members of our families are mentally too disturbed. We are afraid lest they not take any wrong step because of the mental pressure.

 

The present situation of the terminated workers outside the jail

Apart from putting 147 workers behind the bars, the company terminated the service of almost 2500 regular and contract workers without any domestic enquiry and these workers are unemployed now. The condition of their families is also very serious. The situation is that they don’t have any proof of work experience, their career is doomed and whoever of them comes forward in our support, he is arrested and jailed immediately (the arrest of Imaan Khan, who was a member of Provisional Working Committee of MSWU and whose name was not there in the FIR, Charge-sheet or SIT report; also the names of 65 workers are under non-bailable arrest warrants). None of the jailed workers or the terminated workers outside have any occupation to sustain the livelihood of people dependent on them and it is putting everyone under mental pressure. Still, against all these odds, the struggle for justice of our fellow workers outside is giving us hope and energy behind the bars. In this struggle that has gone outside the factory in society now for more than 8 months, news of the solidarity that we have received from various parts of the country from workers, toilers and common people has continued to give us hope, and enthused our spirits.

There is no door of any elected representative that we have not knocked in the space of these 8 months. We’ve taken our appeal for justice from the State Industries minister to the Chief Minister, but the government is bent backwards in trying to take side with the company management and owners rather than listen to us workers. We appeal to the government for the last time, that before we are forced into a situation of committing suicide or killing others, we are given justice which is due to us.

We hope to have your solidarity and your opinion.

 

Maruti Suzuki Workers Union

(The entire Union body of MSWU is behind the bars of Gurgaon Central Jail, where a total of 147 workers continue to languish without any justice, or even bail. This letter of appeal has been sent from there.)

 

Contact: marutiworkerstruggle@gmail.com

 

 

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